गढ़वाल के स्वाधीनता सेनानी: भैरव दत्त धूलिया

गढ़वाल में स्वतंत्रता संग्राम और जन जागरण के अग्रणी योद्धा भैरव दत्त धूलिया का जन्म 1900 में पौड़ी गढ़वाल के मदनपुर पट्टी लंगूर वल्ला डाडामंडी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम हरदत्त था।

भैरव दत्त धूलिया गढ़वाल कांग्रेस कमेटी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। 1921 में, उन्होंने मुकंदीलाल, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, मंगतराम खंतवाल, केशर सिंह रावत और गोवर्धन बड़ोला के साथ कुली बेगार आंदोलन के रूप में असहयोग आंदोलन को पहाड़ों में सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया। 1921 से 1935 तक उन्होंने गढ़वाल में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया।

पत्रकारिता में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। 1931 में वे कुछ समय के लिए पटना से प्रकाशित ‘नवशक्ति’ दैनिक के संपादकीय मंडल में कार्यरत रहे। 13 फरवरी 1937 को उन्होंने लैंसडौन से ‘कर्मभूमि’ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया, जो गढ़वाल और टिहरी रियासत के भारत में विलय तक आंदोलनकारियों की आवाज बना रहा।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने दिल्ली में क्रांतिकारी छवाण सिंह सहित अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को शरण दी, जिसके कारण उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर ब्रिटिश सरकार ने धारा 126 और 129 के तहत मुकदमा चलाकर सात साल की सजा सुनाई। लेकिन 1945 में, अंग्रेजी हुकूमत कमजोर पड़ते ही उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।

स्वतंत्रता के बाद उन्होंने समाज सेवा और पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान देना जारी रखा। 2008 में कोटद्वार में उनका निधन हुआ। उनके पौत्र सुधांशु धूलिया वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं।

भैरव दत्त धूलिया का जीवन संघर्ष, साहस और राष्ट्रप्रेम की अद्वितीय मिसाल है, जो आज भी हर स्वतंत्रता प्रेमी को प्रेरणा देता है।

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