नंतराम नेगी: मुगल सेना को धूल चटाने वाला जौनसार-बावर का शेर

हिमालय की तलहटी में बसा जौनसार-बावर, उत्तराखंड का एक जनजातीय क्षेत्र, अपनी समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली इतिहास के लिए जाना जाता है। यहाँ की भूमि ने ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया, जिन्होंने अपने अदम्य साहस से इतिहास के पन्नों को स्वर्णिम बनाया। इनमें से एक नाम है नंतराम नेगी, जिनकी शौर्यगाथा आज भी लोकगीतों में गूंजती है। मुगल सेना के खिलाफ उनकी वीरता ने उन्हें “गुलदार” की उपाधि दिलाई और भारत के युद्ध इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी।

जौनसार-बावर, देहरादून के पश्चिमी छोर पर स्थित, भले ही भौगोलिक रूप से दुर्गम हो, लेकिन यहाँ की संस्कृति और परंपराएँ इसे अनूठा बनाती हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह क्षेत्र सादगी और साहस का संगम है। इसी वीरभूमि में 1725 के आसपास नंतराम नेगी का जन्म हुआ। उस समय यह इलाका सिरमौर रियासत का हिस्सा था, जिसकी राजधानी नाहन (अब हिमाचल प्रदेश) में थी। नंतराम के पिता लाल सिंह और माता झंझारी देवी थे। बचपन से ही नंतराम में तलवारबाजी और जोखिम भरे खेलों का जुनून था। उनकी फुर्ती और नन्ही उम्र में दिखाया गया साहस उन्हें सिरमौर के राजा शमशेर प्रकाश की सेना में ले आया।

मुगल आक्रमण और नंतराम का उदय

18वीं शताब्दी में मुगल सेना, अब्दुल कादिर के नेतृत्व में, सहारनपुर और हरिद्वार में तबाही मचा रही थी। यह क्रूर सेनापति देहरादून तक पहुँचा और वहाँ गुरुद्वारा गुरुराम राय को नष्ट कर दिया। उसका अगला निशाना सिरमौर और नाहन था। पौंटा साहिब में उसने अपनी सेना के साथ डेरा डाला। उस समय सिरमौर के राजा जगतप्रकाश नाबालिग थे, इसलिए उनकी माँ राजमाता रियासत संभाल रही थीं। मुगल सेना की विशालता देख राजमाता चिंतित हो उठीं। दरबारियों ने एकमत होकर कहा कि इस संकट से केवल नंतराम नेगी ही रियासत को बचा सकते हैं।

युद्ध का आह्वान और इनाम का वादा

नंतराम उस समय जौनसार के मलेथा गाँव में थे। उनके चाचा भूपसिंह सिरमौर दरबार में सलाहकार थे। राजमाता के संदेशवाहक ने दुर्गम पहाड़ियों को पार कर नंतराम तक आक्रमण का समाचार पहुँचाया। नंतराम बिना देरी किए नाहन पहुँचे। राजदरबार में उन्हें विशेष तलवार, ढाल और कवच देकर सम्मानित किया गया। राजमाता ने वचन दिया कि यदि वे अब्दुल कादिर का सिर काट लाए, तो उन्हें मलेथा, स्यासू और मोहराड की जागीरें मिलेंगी। साथ ही, उनके परिवार का खर्च दरबार उठाएगा और कालसी में खजांची का पद उनके वंशजों के लिए सुरक्षित रहेगा।

नंतराम ने कटासन भवानी मंदिर में माँ का आशीर्वाद लिया और दुश्मन के नाश का संकल्प लेकर यमुना तट की ओर बढ़े, जहाँ मुगल सेना डेरा डाले हुए थी।

यमुना तट पर ऐतिहासिक युद्ध

मुगल सैनिक अपनी ताकत के नशे में चूर थे। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कोई उनकी राह रोक सकता है। लेकिन नंतराम ने अपनी छोटी टुकड़ी के साथ अचानक हमला बोला। मुगल सेना हक्की-बक्की रह गई। नंतराम सीधे अब्दुल कादिर के खेमे में घुसे और एक ही वार में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। सेनापति की मौत से मुगल सेना में अफरा-तफरी मच गई। कई सैनिक यमुना के तेज बहाव में बह गए। नंतराम ने कटे सिर को सिरमौर भेज दिया और खुद युद्ध में डटे रहे।

लेकिन युद्ध का मोड़ तब आया, जब उनका घोड़ा घायल हो गया। पहाड़ी ढलानों पर अकेले पड़े नंतराम पर मुगल सेना ने पूरा जोर लगा दिया। 14 फरवरी, 1746 को वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत ने सैनिकों में जोश भरा और छोटी सी टुकड़ी ने मुगल सेना को खदेड़ दिया। विजय का परचम सिरमौर में लहराया।

“गुलदार” की उपाधि और विरासत

सिरमौर के राजा ने नंतराम के परिवार को “गुलदार” की उपाधि से सम्मानित किया, जो उनके शेर जैसे साहस का प्रतीक थी। वादे के मुताबिक, मलेथा, स्यासू और मोहराड की जागीरें उनके वंशजों को दी गईं। आज भी उनके वंशज हिमाचल के मोहराड (शिलाई तहसील, सिरमौर) और उत्तराखंड के मलेथा (चकराता तहसील, देहरादून) में रहते हैं। उन्हें नेगी गुलदार, चाक्करपूत और बैराठीया जैसे नामों से जाना जाता है। जौनसारी लोकगीत “हारुल” में उनकी वीरता आज भी गाई जाती है।

इतिहास को जीवंत रखने की कोशिश

नंतराम का कोई चित्र उपलब्ध नहीं था। 24 साल पहले सिमोग के श्रीचंद शर्मा ने बुजुर्गों की यादों के आधार पर उनकी तस्वीर तैयार की। साहिया में उनकी प्रतिमा के अनावरण पर वंशजों ने प्राचीन हथियारों के साथ उनकी गाथा का प्रदर्शन किया। ये हथियार आज भी उनके परिवार के पास धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं।

नंतराम नेगी की कहानी नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के बलिदान और साहस से प्रेरणा लेने का संदेश देती है। वे एक ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया और “गुलदार” बनकर इतिहास में अमर हो गए।

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